Ticker

6/recent/ticker-posts

Header Ads Widget

Responsive Advertisement

अन्याय के विरुद्ध ज्वाला: द्रौपदी का संघर्ष The Flame Against Injustice: Draupadi's Struggle-

 

द्रौपदी Draupadi

द्रौपदी की कथा महाभारत की महान गाथाओं में से एक है। उनका जीवन वीरता, प्रेम, अपमान और धर्मयुद्ध से भरा हुआ है। आइए, द्रौपदी के अद्भुत जीवन की यात्रा पर चलते हैं।



अग्निजन्मा द्रौपदी (The Fire-Born Draupadi)

द्रौपद, पाँचाल देश के राजा थे। द्रोणाचार्य से पराजित होकर उनका अपमान हुआ था। बदला लेने के लिए उन्होंने पुत्र प्राप्ति की इच्छा से यज्ञ करवाया। यज्ञ से धृष्टद्युम्न नाम का एक शक्तिशाली पुत्र तो हुआ ही, साथ ही यज्ञ की आहुति से एक दिव्य कन्या भी प्रकट हुई। कन्या का रंग गहरे नीले कमल के समान था, इसलिए उन्हें कृष्णा या याज्ञसेनी भी कहा जाता था। द्रुपद ने इस कन्या का पालन-पोषण अपनी पुत्री के रूप में किया और उसका नाम द्रौपदी रखा।

स्वयंवर में विवाह (The Swayamvara)

द्रौपदी अपनी अद्वितीय सुंदरता और प्रतिभा के लिए प्रसिद्ध हुईं। उनके स्वयंवर का आयोजन किया गया, जिसमें उस समय के सभी राजकुमारों को आमंत्रित किया गया। स्वयंवर में एक मछली की आकृति का यंत्र बनाया गया था, और उसके नीचे एक चक्र घूम रहा था।



लक्ष्य यह था कि धनुष से निशाना लगाकर उस चक्र की आंख में बाण मारे। कई राजकुमार असफल रहे, परंतु अर्जुन, जो कि पाण्डवों में से एक थे, उन्होंने इस कठिन कार्य को सफलतापूर्वक पूरा किया। इस प्रकार, द्रौपदी, अर्जुन की पत्नी बनीं।

पांच पत्नियां (The Five Husbands)

द्रौपदी के विवाह के बाद, एक विचित्र घटना घटी। पाँचों पांडव, युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव, द्रौपदी के कक्ष में प्रवेश कर रहे थे। द्रौपदी ने यह देखकर घबरा गईं। उनकी माता कृपाचार्या ने उन्हें बताया कि उनके पूर्व जन्म में उन्होंने भगवान शिव से पाँच पति पाने का वर मांगा था। इसी कारण से द्रौपदी का विवाह पाँचों पाण्डवों से हुआ।



द्रौपदी ने इस विवाह को धर्म के अनुसार स्वीकार कर लिया। उन्होंने पाँचों पाण्डवों के साथ समान व्यवहार किया और उनमें प्रेम और सद्भाव बनाए रखा। यह बहुपत्नी विवाह व्यवस्था उस समय असामान्य थी, लेकिन पाण्डवों ने द्रौपदी के प्रति सम्मान और प्रेम बनाए रखा।

द्यूत क्रीड़ा का अपमान (The Humiliation of Dice Game)

पाण्डवों को कौरवों के साथ जुए का खेल खेलने के लिए मजबूर किया गया। इस द्यूत क्रीड़ा में युधिष्ठिर ने अपना सारा राजपाट, धन-दौलत और अंत में स्वयं को और द्रौपदी को भी दांव पर लगा दिया और हार गए। दुर्योधन के आदेश पर दुःशासन ने सभा में द्रौपदी को खींचकर लाया और उन्हें अपमानित करने का प्रयास किया।



द्रौपदी ने धर्मराज युधिष्ठिर और भीष्म पितामह से सवाल किया कि क्या उनके पति जुए में हार गए थे या उन्हें भी दांव पर लगाया गया था। भीष्म ने बताया कि द्रौपदी का सवाल वाजिब है, क्योंकि जुए में स्त्री को दांव पर नहीं लगाया जा सकता। इस प्रकार, द्रौपदी सभा में हुए अपमान से कुछ हद तक बचाई गईं।

प्रतिशोध की ज्वाला (The Fire of Revenge)

द्रौपदी के अपमान ने पाण्डवों के हृदय में आग लगा दी। उन्होंने द्रौपदी के अपमान का बदला लेने की प्रतिज्ञा ली। द्रौपदी का यह अपमान महाभारत युद्ध का एक प्रमुख कारण बना

Post a Comment

0 Comments